दर्द से निस्बत



जो भी ख़लिश* थी दिल में अहसास हो गई है
दर्द से निस्बत* मुझे कुछ खास हो गई है

वज़ूद हर खुशी का ग़म से है इस जहां में
फिर ज़िन्दगी क्यूं इतनी उदास हो गई है

चराग़ जल रहा है यूँ मेरी मुहब्बत का
दिल है दीया, तमन्ना कपास हो गई है

शिकवा नहीं है कोई अब उनसे बेरुख़ी का
यादों में मुहब्बत की अरदास हो गई है

नदीश मुहब्बत में वो वक़्त आ गया है
तस्कीन* प्यास की भी अब प्यास हो गई है

चित्र साभार- गूगल

ख़लिश- चुभन
निस्बत- लगाव
तस्कीन- संतुष्टि

Post a Comment

14 Comments

  1. उमदा बेहतरीन गजल।

    ReplyDelete
  2. बहुत सुंदर गजल 👌

    ReplyDelete
  3. बेहतरीन गजल , भावविभोर कर दिया

    ReplyDelete
  4. आपकी ये रचना भी आपकी सभी रचनाओं की तरह खास और अनूठी है

    ReplyDelete
  5. बहुत ही उम्दा ग़ज़ल , लाजवाब और बेहतरीन ।

    ReplyDelete