दर्द का लम्हा



यूँ मुसलसल ज़िन्दगी से मसख़री करते रहे
ज़िन्दगी भर  आरज़ू-ए-ज़िन्दगी  करते  रहे 

एक  मुद्दत  से  हक़ीक़त  में नहीं आये यहाँ 
ख़्वाब की गलियों में जो आवारगी करते रहे 

बड़बड़ाना  अक्स  अपना आईने में देखकर 
इस तरह ज़ाहिर वो अपनी  बेबसी करते रहे 

रोकने की कोशिशें तो खूब कीं पलकों ने पर 
इश्क़ में  पागल थे  आँसू  ख़ुदकुशी करते रहे

आ गया एहसास के  फिर चीथड़े  ओढ़े  हुए 
दर्द  का  लम्हा  जिसे  हम  मुल्तवी करते रहे

दिल्लगी, दिल की लगी में फर्क कितना है नदीश 
दिल लगाया हमने  जिनसे  दिल्लगी  करते रहे

चित्र साभार- गूगल
मुल्तवी- टालना

टिप्पणियां

  1. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है https://rakeshkirachanay.blogspot.in/2018/04/66.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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  2. वाह्ह्ह...बेहद सराहनीय गज़ल लोकेश जी...हर बंध उम्दा है।👌

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  3. यूँ मुसलसल ज़िन्दगी से मसख़री करते रहे
    ज़िन्दगी भर आरज़ू-ए-ज़िन्दगी करते रहे
    आ गया एहसास के फिर चीथड़े ओढ़े हुए
    दर्द का लम्हा जिसे हम मुल्तवी करते रहे--- बहुत ही लाजवाब अशार के साथ सुंदर गजल | बधाई आदरणीय लोकेश जी |

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  4. Ap mujhe kuch ghazal ke collection vgerha suggest kr skte h ji se padh kr mai isme apni smjh badha saku..mujhe sbse zyada dikkt rhyming words me hoti h

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    1. शिवानी जी आप डॉ बशीर बद्र और राहत इंदौरी, दुष्यंत कुमार को पढ़िये
      शब्द ज्ञान भी बढ़ेगा और रदीफ़ काफिया भी समझ सकेंगी

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  5. आँसुओं का काम ही यही है ...
    आना और MIT जाना मुहब्बत के नाम पर ... बहुत ख़ूब ...

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