कड़ी है धूप और न साया-ए-शजर यारों
न हमसफ़र है, उसपे ज़ीस्त का सफ़र यारों

न हक़ीक़त की सदा और न ख़्वाब की आहट
बहुत उदास है यादों की रहगुज़र यारों

आस की छत, चराग़-ए-अश्क़, दरो-दीवारे-ख़्वाब
लिए चलता हूँ मैं कांधों पे अपना घर यारों

बिखर गई गुले-एहसास पे ग़म की शबनम
मिला रक़ीब बन के था जो मोतबर यारों

मिला नहीं है अपने आप से मुद्दत से नदीश
उलझ गया है वो रिश्तों में इस कदर यारों

चित्र साभार- गूगल

साया-ए-शजर- पेड़ की छांव
ज़ीस्त- जीवन, ज़िन्दगी
चराग़-ए-अश्क़- आंसू के दीये
दरो-दीवारे-ख़्वाब- ख़्वाब के दरवाजे और दीवार
गुले-एहसास- अनुभूति का फूल
रक़ीब- प्रेम में प्रतिद्वंद्वी
मोतबर- विश्वसनीय, भरोसेमंद
मुद्दत- लंबा अंतराल, काफी समय से