व्याकुल हो जब भी मन मेरा
तब-तब गीत नया गाता है
आँखों में इक सपन सलोना 
चुपके-चुपके आ जाता है

जीवन के सारे रंगों से 
भीग रहा है मेरा कण-कण
मुझे कसौटी पर रखकर ये
समय परखता है क्यूँ क्षण-क्षण

गड़ता है जो भी आँखों में
समय वही क्यों दिखलाता है

जाने किस पल हुआ पराया
वो भी तो मेरा अपना था 
रिश्ता था कच्चे धागों का
मगर टूटना इक सदमा था

घातों से चोटिल मेरा मन
आज बहुत ही घबराता है

जोड़-जोड़ के तिनका-तिनका 
नन्हीं चिड़िया नीड़ बनती
मिलकर बेबस-बेकस चीटी
इक ताकतवर भीड़ बनती

छोटी-छोटी खुशियाँ जी लो
यही तो जीवन कहलाता है



 चित्र साभार- गूगल