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पंखुड़ी गुलाब की

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अपनी आँखों से मुहब्बत का बयाना कर दे नाम पे मेरे ये अनमोल खज़ाना कर दे सिमटा रहता है किसी कोने में, बच्चे जैसा मेरे एहसास को छू ले तू, सयाना कर दे
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रंग भरूँ शोखी में आज शबाबों का रुख़ पे तेरे मल दूँ अर्क गुलाबों का होंठों का आलिंगन कर यूँ होंठों से हो जाये श्रृंगार हमारे ख़्वाबों का
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हैं सुर्ख़ होंठ जैसे पंखुड़ी गुलाब की रुख़सार हैं जैसे कि झलक माहताब की आँखों की चालबाजियां, ख़ुश्बू, बदन और रंग सबसे जुदा है दास्तां तेरे शबाब की
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चित्र साभार- गूगल

महकती रही ग़ज़ल

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जब भी मेरे ज़ेहन में संवरती रही ग़ज़ल तेरे ही ख़्यालों से महकती रही ग़ज़ल झरते रहे हैं अश्क़ भी आँखों से दर्द की और उंगलियाँ एहसास की लिखती रही ग़ज़ल
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आँख से चेहरा तेरा जाता नहीं कभी दिल भूल के भी भूलने पाता नहीं कभी हो धूप ग़म की या हो अश्क़ों की बारिशें फूल तेरी यादों का मुरझाता नहीं कभी
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लब पे लबों की छुअन का एहसास रहने दो बस एक पल तो खुद को मेरे पास रहने दो ये तय है, तुम भी छोड़ के जाओगे एक दिन लेकिन कहीं तो झूठा ही विश्वास रहने दो
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चित्र साभार- गूगल

सुनहरा मौसम

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बिखरी शाम सिसकता मौसम बेकल, बेबस, तन्हा मौसम
तन्हाई को समझ रहा है लेकर चाँद खिसकता मौसम
शब के आंसू चुनने आया लेकर धूप सुनहरा मौसम
चाँद, चौदहवीं का हो छत पर फिर देखो मचलता मौसम
ज़ुल्फ़ चाँदनी की बिखरा कर बनकर रात महकता मौसम
खिलती कलियों की संगत में फूलों सा ये खिलता मौसम
तेरी यादों की बूंदों से ठंडा हुआ, दहकता मौसम
धूप-छाँव बनकर नदीश की ग़ज़लों में है ढलता मौसम
चित्र साभार- गूगल

कह सकते हो

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यादों की इक छाँव में बैठा रहता हूँ  अक्सर दर्द के गाँव में बैठा रहता हूँ तुमने मुझसे हाल जहाँ पूछा था मेरा मैं अब भी उस ठाँव में बैठा रहता हूँ

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तुमको गर हैरानी है, तो कह सकते हो रिश्ता ये बेमानी है, तो कह सकते हो मैं बाहर से जो भी हूँ वो ही अंदर से ये मेरी नादानी है, तो कह सकते हो

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चित्र साभार- गूगल

दूर मुझसे न रहो तुम

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दूर मुझसे न रहो तुम यूँ बेखबर बन कर क़रीब आओ चलो साथ हमसफ़र बन कर
जहाँ भी देखता हूँ, बस तुम्हारा चेहरा है बसी हो आँख में तुम ही मेरी नज़र बन कर
सफ़र में तेज हुई धूप ग़मों की जब भी तुम्हारी याद ने साया किया शजर* बन कर
महक रही है हरेक सांस में ख़ुश्बू तेरी मेरे वज़ूद में तू है दिलो-जिगर बन कर
शब-ए-हयात* में उल्फ़त* की रोशनी लेकर चले भी आओ ज़िन्दगी में तुम सहर बन कर
तुम्हारे नाम पर कर दे, ये ज़िन्दगी भी नदीश रहो ता-उम्र मेरे यूँ ही तुम अगर बन कर

चित्र साभार- गूगल
शजर- पेड़ शब-ए-हयात- जीवन की रात उल्फ़त- प्रेम

परिन्दे ख़्वाब के

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न जाने हाथ में कैसे हसीं खज़ाने लगे खिज़ां के रोजो-शब भी आजकल सुहाने लगे
तेरी यादों की दुल्हन सज गई है यूँ दिल में किसी बारात में खुशियों के शामियाने लगे
वफ़ा के ज़िक्र पे अंदाज़ ये रहा उनका झुका के आँख वो पलकों से मुस्कुराने लगे
मुझे जो कहते थे कि तुम हो मेरे दिल का सुकूं जो वक़्त बदला तो वो ही मुझे भुलाने लगे
थमी जो बारिशें अश्क़ों की ऐ नदीश कभी परिन्दे ख़्वाब के आँखों में घर बसाने लगे
चित्र साभार- गूगल

फूल खिला के आया हूँ

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अश्क़ों की हथेली पे
दामन के ख़्वाब सजा के आया हूँ मैं अपनी वफ़ा के सूरज की
इक रात बना के आया हूँ
नादान हवाएं क्यों इसको
इक प्यार का मौसम समझ रहीं मैं अहले-जहां के सीनों में
तूफान उठा के आया हूँ
आँखो के समंदर में शायद,
बेचैनी करवट लेती है तेरी यादों के जंगल में,
इक बाग बिठा के आया हूँ
इतराती है खुशबू ख़ुद पे,
काँटों में गहमागहमी है मैं सन्नाटों के सहरा में,
कुछ फूल खिला के आया हूँ
दुनिया के बंधन से तुझ तक,
बस चार कदम की दूरी थी मत पूछ कि मैं तुझ तक
कितने सैलाब हटा के आया हूँ
ये अंधियारे कुछ देर के हैं,
अब तू नदीश मायूस न हो मैं मुठ्ठी में इच्छाओं की
इक भोर छिपा के आया हूँ

चित्र साभार- गूगल

जब से बसे हो आँख में

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जब से ऐ दर्द तुझसे *शनासाई बढ़ गई चेहरे की मेरे तब से ही *रानाई बढ़ गई
आंसू बहुत ही खर्च हुये ख़ातिर-ए-वफ़ा दुनिया में यारों कितनी मंहगाई बढ़ गई
लम्हें, महीने, घंटे, दिन, ये साल ओ' सदी तन्हाईयों से आगे भी तन्हाई बढ़ गई
आने लगे हैं ख़्वाब में, अब रंग सौ नज़र जब से बसे हो आँख में, बीनाई बढ़ गई
उड़ते रहे कपूर की तरह, ये सुख नदीश पर्वत की तरह दर्द की, वो राई बढ़ गई
शनासाई- जान-पहचान, परिचय रानाई- सौंदर्य, चमक बीनाई- दृष्टि, विज़न
चित्र साभार-गूगल

सारे मनाज़िर लगे हैं फीके से

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तेरी यादों ने कुरेदा है किस तरीके से ज़ख़्म हर, दिल का महकने लगा सलीके से तेरे ख़्याल में वो लुत्फ़ मुझे आने लगा  नज़र को सारे मनाज़िर लगे हैं फीके से ~~~~~
तेरी नजर में बुरा हूँ तो बुरा कह दे ना  तू खुश है, या है मुझसे ख़फ़ा कह दे ना  मेरी वफ़ा तुझे लगे वफ़ा, वफ़ा कह दे  अगर लगे कि दगा है तो दगा कह दे ना ~~~~~
चित्र साभार- गूगल

गाँव में यादों के

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नज़र को आस नज़र की है मयकशी के लिए तड़प रहे हैं बहुत आज हम किसी के लिए
ये ग़म हयात के न जाने ख़त्म कब होंगे मुंतज़िर है ये दिल इक लम्हें की खुशी के लिए
नहीं लगता है ये मुमकिन मुझे सफ़र तन्हा हमसफ़र चाहिए मुझको भी ज़िन्दगी के लिए
गाँव में यादों के छाई है जो सावन की घटा बरस ही जाए तो अच्छा है तिश्नगी के लिए
धूप रख के भी अंधेरों से वफ़ा की हमने आज दिल भी जलाएंगे रोशनी के लिए
ढलें तो आँख से आंसू मगर ग़ज़ल की तरह उम्र नदीश की गुजरे तो शायरी के लिए
चित्र साभार- गूगल

हर घड़ी

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मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से फ़ुरसत में आज गिन रहा हूँ इत्मिनान से
आँगन तेरी आँखों का न हो जाये कहीं तर डरता हूँ इसलिए मैं वफ़ा के बयान से
साहिल पे कुछ भी न था तेरी याद के सिवा दरिया भी थम चुका था अश्क़ का उफ़ान से
नज़रों से मेरी नज़रें मिलाता है हर घड़ी इकरार-ए-इश्क़ पर नहीं करता ज़ुबान से
कटती है ज़िन्दगी नदीश की कुछ इस तरह हर लम्हां गुज़रता है नये इम्तिहान से
चित्र साभार- गूगल

रस्ता मुहब्बत का

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अपने कुछ ऐसे हैं पूछो मत कैसे हैं
रस्ता मुहब्बत का गुल, काँटों जैसे हैं
तुम से क्या मतलब, हम ऐसे या वैसे हैं
झुक जाएगी दुनिया खीसे में पैसे हैं?
दुनिया में हम जैसे बस जैसे-तैसे हैं
चित्र साभार- गूगल

खो गया मैं

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प्यार जब भी तेरा याद आने लगा ज़ख्म-ए-दिल मेरा मुस्कुराने लगा
लाखों दर्द अपने दिल मे छिपाये हुए अपने चेहरे पे खुशियां सजाये हुए खो गया मैं रिवाजों की इस भीड़ में और खुद से ही खुद को छिपाने लगा
ज़ख्म, ख्वाबों के रिसते रहे रातभर दर्द, कदमों पे बिछते रहे रातभर तेरे वादों के जख्मों पे फिर मैं सनम तेरी यादों का मरहम लगाने लगा
धूप खिलवत की तन को भिगोती रही चाहतें रात भर मेरी रोती रही फिर भी पतवार उम्मीद की थामकर सब्र की धार मैं आजमाने लगा
हर खुशी को क्यूँ मुझसे ही तकरार था क्यूँ निशाने पे ग़म के मैं हर बार था जब भी, जो भी रुचा छिन गया मुझसे वो जो मेरा था मुझे मुंह चिढ़ाने लगा
चित्र साभार- गूगल

कोई दवा न मिली

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फेफड़ों को खुली हवा न मिली न मिली आपसे वफ़ा न मिली
दुश्मनी ढूँढ़-ढूँढ़ कर हारी दोस्ती है जो लापता, न मिली
वक़्त पर छोड़ दिया है सब कुछ दर्दे-दिल की कोई दवा न मिली
हर किसी हाथ में मिला खंज़र आपकी बात भी जुदा न मिली
सोचता है नदीश ये अक्सर ज़िन्दगी आपके बिना न मिली
चित्र साभार- गूगल

नमक ग़मों का

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शब्दों की जुबानी लिखता हूँ गीतों की कहानी लिखता हूँ
दर्दों के विस्तृत अम्बर में भावों के पंछी उड़ते हैं नाचे हैं शरारे उल्फ़त के जब तार हृदय के जुड़ते हैं
हर सुबह से शबनम लेकर फिर शाम सुहानी लिखता हूँ
जब दर्द से जुड़ता है रिश्ता हर बात प्रीत से होती है तब भावनाओं के धागे में अश्क़ों को आँख पिरोती है
ऐसे ही अपनेपन को मैं रिश्तों की निशानी लिखता हूँ
पानी में आँखों के भीतर ये नमक ग़मों का घुलता है जब नेह की होती है बारिश तब मैल हृदय का धुलता है
दरिया के निर्मल जल सा मैं आँखों का पानी लिखता हूँ
चित्र साभार- गूगल

मौसम है सुहाना दिल का

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चुन लिया जबसे ठिकाना दिल का। खूब मौसम है सुहाना दिल का।।
सांस लेना भी हो गया मुश्किल खेल समझे थे लगाना दिल का।।
कैसे करते न नाम पर तेरे मुस्कुराहट है या बयाना दिल का।।
थक गई है उनींदे रस्तों से नींद को दे दो न शाना दिल का।।
भूल जाओ 'नदीश' अब ख़ुद को इश्क़ है, रोग पुराना दिल का।।
चित्र साभार- गूगल

जो मेरा था

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चला शहर को तो वो गांव बेच आया है अजब मुसाफ़िर है जो पांव बेच आया है मकां बना लिया माँ-बाप से अलग उसने शजर ख़रीद लिया छांव बेच आया है
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जो मेरा था तलाश हो गया हाँ यक़ीन था काश हो गया मेरी आँखों में चहकता था परिंदा ख़्वाबों का लाश हो गया
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किनारों से बहुत रूठा हुआ है कलेजा नाव का सहमा हुआ है पटकती सर है, ये बेचैन लहरें समंदर दर्द में डूबा हुआ है
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चित्र साभार- गूगल

यादों के हवाले

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कश्कोल लेके आया हूँ, आँखों में आस का रक्खोगे पास, सिर्फ तुम ही मेरी प्यास का
यादों के हवाले ही, इसे कर दो आख़िरश कुछ और ही चारा नहीं दिल-ए-उदास का
कर ली है इसलिए भी तो नींदों से दुश्मनी आँखों में ख़्वाब जागता रहता है ख़ास का
निकला है उसी शख़्स से मीलों का फासला लगता था मेरे दिल को जो धड़कन के पास का
महसूस ये हुआ है, शब-ए-वस्ल ऐ नदीश लिपटे हैं आग से बदन लिए कपास का
चित्र साभार- गूगल

ये आलम उदास है

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तुम बिन बहार का मौसम उदास है। आकर तो देखो ये आलम उदास है।।
खिलने से पहले ही मसले हैं गुंचे  मंज़र ये देखकर शबनम उदास है।।
आराम आये भी तो कैसे आये ज़ख्मों की शिद्दत से मरहम उदास है।।
बीमारे-उल्फ़त हैं कितने न पूछो कोई ज़ियादा कोई कम उदास है।।
आके किसी रोज देखो नदीश को जब से गये हो तुम हरदम उदास है।।
चित्र साभार-गूगल

आशाओं का दामन

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ये सहज प्रेम से विमुख ह्रदय क्यों अपनी गरिमा खोते हैं समझौतों पर आधारित जो वो रिश्ते भार ही होते हैं
क्षण-भंगुर से इस जीवन सा हम आओ हर पल को जी लें जो मिले घृणा से, अमृत त्यागें और प्रेम का विष पी लें
स्वीकारें वो ही उत्प्रेरण, जो बीज अमन के बोते हैं
आशाओं का दामन थामे हर दुःख का मरुथल पार करें इस व्यथित हक़ीकत की दुनिया में  सपनो को साकार करें
सुबह गए पंक्षी खा-पीकर, जो शाम हुई घर लौटे हैं
जो ह्रदय, हीन है भावों से उसमें निष्ठा का मोल कहाँ उसके मानस की नदिया में अनुरागों का किल्लोल कहाँ
है जीवित, जो दूजे दुख में अपने एहसास भिगोते हैं
चित्र साभार- गूगल