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पंखुड़ी गुलाब की
महकती रही ग़ज़ल
सुनहरा मौसम
कह सकते हो
दूर मुझसे न रहो तुम
परिन्दे ख़्वाब के
फूल खिला के आया हूँ
जब से बसे हो आँख में
सारे मनाज़िर लगे हैं फीके से
गाँव में यादों के
हर घड़ी
रस्ता मुहब्बत का
खो गया मैं
कोई दवा न मिली
नमक ग़मों का
मौसम है सुहाना दिल का
जो मेरा था
यादों के हवाले
ये आलम उदास है
आशाओं का दामन