आशाओं का दामन


ये सहज प्रेम से विमुख ह्रदय
क्यों अपनी गरिमा खोते हैं
समझौतों पर आधारित जो
वो रिश्ते भार ही होते हैं

क्षण-भंगुर से इस जीवन सा हम
आओ हर पल को जी लें
जो मिले घृणा से, अमृत त्यागें
और प्रेम का विष पी लें

स्वीकारें वो ही उत्प्रेरण, जो
बीज अमन के बोते हैं

आशाओं का दामन थामे
हर दुःख का मरुथल पार करें
इस व्यथित हक़ीकत की दुनिया में 
सपनो को साकार करें

सुबह गए पंक्षी खा-पीकर, जो
शाम हुई घर लौटे हैं

जो ह्रदय, हीन है भावों से
उसमें निष्ठा का मोल कहाँ
उसके मानस की नदिया में
अनुरागों का किल्लोल कहाँ

है जीवित, जो दूजे दुख में
अपने एहसास भिगोते हैं

चित्र साभार- गूगल


टिप्पणियां

  1. बेहतरीन..., लाजवाब...., अत्यन्त सुन्दर ।

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  2. क्या खूबसूरत अंदाज़ है. मन को उभरानेवाली एक दिलकश रचना

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार ८ जनवरी २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  4. स्वीकारें वो ही उत्प्रेरण, जो
    बीज अमन के बोते हैं.......बहुत खूब .........

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  5. बहुत सुन्दर, प्रेरक और भावपूर्ण अभिव्यक्ति...

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  6. वाह बहुत सुन्दर लाजवाब रचना।

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  7. बेहतरीन ...
    आशा और उम्मीद का दामन सदेव पकड़ के रखना चाहिए ...
    जो है जीवन जीना चाहिए ... दूसरों के दुःख कम करके जीना चाहिए ...
    सुन्दर शब्द ...

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  8. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

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  9. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है. https://rakeshkirachanay.blogspot.com/2019/01/104.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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  10. वाह बहुत खूब आशावादी और सार्थक रचना ।

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  11. बहुत ही सुंदर रचना, लोकेश जी!

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  12. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (15-04-2019) को "भीम राव अम्बेदकर" (चर्चा अंक-3306) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    - अनीता सैनी

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  13. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

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  14. खूबसूरत एहसास की सुंदर रचना

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