यादों के हवाले




कश्कोल लेके आया हूँ, आँखों में आस का
रक्खोगे पास, सिर्फ तुम ही मेरी प्यास का

यादों के हवाले ही, इसे कर दो आख़िरश
कुछ और ही चारा नहीं दिल-ए-उदास का

कर ली है इसलिए भी तो नींदों से दुश्मनी
आँखों में ख़्वाब जागता रहता है ख़ास का

निकला है उसी शख़्स से मीलों का फासला
लगता था मेरे दिल को जो धड़कन के पास का

महसूस ये हुआ है, शब-ए-वस्ल ऐ नदीश
लिपटे हैं आग से बदन लिए कपास का

चित्र साभार- गूगल

टिप्पणियां

  1. वाह !!वाह ,बहुत खूब...... ,सादर

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  2. निकला है उसी शख़्स से मीलों का फासला
    लगता था मेरे दिल को जो धड़कन के पास का
    बेहद लाजवाब गजल हमेशा की तरह....
    वाह!!!

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  3. निकला है उसी शख़्स से मीलों का फासला
    लगता था मेरे दिल को जो धड़कन के पास का
    बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल

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  4. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १५ मार्च २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  5. निकला है उसी शख़्स से मीलों का फासला
    लगता था मेरे दिल को जो धड़कन के पास का
    ...वाह, लाज़वाब...सभी अशआर बहुत उम्दा..

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  6. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है. https://rakeshkirachanay.blogspot.com/2019/03/113.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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  7. वाह बहुत ही सुन्दर रचना

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  8. कोई हसीं ख्वाब हो तो नींद से बेरुखी होने में बुराई नहीं ...
    लाजवाब शेर हैं ग़ज़ल के लोकेश जी ...

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