नज़र को आस नज़र की है मयकशी के लिए
तड़प रहे हैं बहुत आज हम किसी के लिए

ये ग़म हयात के न जाने ख़त्म कब होंगे
मुंतज़िर है ये दिल इक लम्हें की खुशी के लिए

नहीं लगता है ये मुमकिन मुझे सफ़र तन्हा
हमसफ़र चाहिए मुझको भी ज़िन्दगी के लिए

गाँव में यादों के छाई है जो सावन की घटा
बरस ही जाए तो अच्छा है तिश्नगी के लिए

धूप रख के भी अंधेरों से वफ़ा की हमने
आज दिल भी जलाएंगे रोशनी के लिए

ढलें तो आँख से आंसू मगर ग़ज़ल की तरह
उम्र नदीश की गुजरे तो शायरी के लिए

चित्र साभार- गूगल