सारे मनाज़िर लगे हैं फीके से





तेरी यादों ने कुरेदा है किस तरीके से
ज़ख़्म हर, दिल का महकने लगा सलीके से
तेरे ख़्याल में वो लुत्फ़ मुझे आने लगा 
नज़र को सारे मनाज़िर लगे हैं फीके से
~~~~~

तेरी नजर में बुरा हूँ तो बुरा कह दे ना 
तू खुश है, या है मुझसे ख़फ़ा कह दे ना 
मेरी वफ़ा तुझे लगे वफ़ा, वफ़ा कह दे 
अगर लगे कि दगा है तो दगा कह दे ना
~~~~~

चित्र साभार- गूगल

टिप्पणियां

  1. यादों की इक छाँव में बैठा रहता हूँ
    अक्सर दर्द के गाँव में बैठा रहता हूँ
    तुमने मुझसे हाल जहाँ पूछा था मेरा
    मैं अब भी उस ठाँव में बैठा रहता हूँ
    ~~~~~वाह बेहतरीन प्रस्तुति

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    1. बहुत बहुत आभार आदरणीया

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    2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (13-11-2019) को      "गठबन्धन की नाव"   (चर्चा अंक- 3518)     पर भी होगी। 
      --
      सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
       --
      हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
      सादर...!
      डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

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    3. बहुत बहुत आभार आदरणीय

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  2. बहुत खूब लोकेश जी ...
    कमाल के मुक्तक ... मन में गहरे उतारते ...

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 12 नवंबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद! ,

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  4. सभी मुक्तक एक से बढ़ कर एक...बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति ।

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