फूल खिला के आया हूँ



अश्क़ों की हथेली पे
दामन के ख़्वाब सजा के आया हूँ
मैं अपनी वफ़ा के सूरज की
इक रात बना के आया हूँ

नादान हवाएं क्यों इसको
इक प्यार का मौसम समझ रहीं
मैं अहले-जहां के सीनों में
तूफान उठा के आया हूँ

आँखो के समंदर में शायद,
बेचैनी करवट लेती है
तेरी यादों के जंगल में,
इक बाग बिठा के आया हूँ

इतराती है खुशबू ख़ुद पे,
काँटों में गहमागहमी है
मैं सन्नाटों के सहरा में,
कुछ फूल खिला के आया हूँ

दुनिया के बंधन से तुझ तक,
बस चार कदम की दूरी थी
मत पूछ कि मैं तुझ तक
कितने सैलाब हटा के आया हूँ

ये अंधियारे कुछ देर के हैं,
अब तू नदीश मायूस न हो
मैं मुठ्ठी में इच्छाओं की
इक भोर छिपा के आया हूँ

चित्र साभार- गूगल

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12 Comments

  1. जी नमस्ते,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (३०-११ -२०१९ ) को "ये घड़ी रुकी रहे" (चर्चा अंक ३५३५) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 29 नवम्बर 2019 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. बहुत बहुत आभार आदरणीया

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  3. इतराती है खुशबू ख़ुद पे, काँटों में गहमागहमी है
    मैं सन्नाटों के सहरा में, कुछ फूल खिला के आया हूँ
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

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  4. ये अंधियारे कुछ देर के हैं, अब तू नदीश मायूस न हो
    मैं मुठ्ठी में इच्छाओं की इक भोर छिपा के आया हूँ
    बेहतरीन और लाजवाब सृजन ।

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  5. वफ़ा के सूरज की रात !
    वाह जबरदस्त भाव
    उम्दा/बेहतरीन।

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  6. वाह! बेहद खूबसूरत ग़ज़ल।
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है ।
    iwillrocknow.com

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