परिन्दे ख़्वाब के


न जाने हाथ में कैसे हसीं खज़ाने लगे
खिज़ां के रोजो-शब भी आजकल सुहाने लगे

तेरी यादों की दुल्हन सज गई है यूँ दिल में
किसी बारात में खुशियों के शामियाने लगे

वफ़ा के ज़िक्र पे अंदाज़ ये रहा उनका
झुका के आँख वो पलकों से मुस्कुराने लगे

मुझे जो कहते थे कि तुम हो मेरे दिल का सुकूं
जो वक़्त बदला तो वो ही मुझे भुलाने लगे

थमी जो बारिशें अश्क़ों की ऐ नदीश कभी
परिन्दे ख़्वाब के आँखों में घर बसाने लगे

चित्र साभार- गूगल

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24 Comments

  1. बहुत खूब ...
    सच्चे शेर ... बहुत ही लाजवाब ... दिली दाद मेरी ...

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  2. बहुत खूब ! बेहतरीन व लाजवाब सृजन ।

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  3. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 02 दिसम्बर 2019 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. मेरी रचना के चयन के लिए बहुत बहुत आभार आपका

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  4. मुझे जो कहते थे कि तुम हो मेरे दिल का सुकूं
    जो वक़्त बदला तो वो ही मुझे भुलाने लगे
    थमी जो बारिशें अश्क़ों की ऐ नदीश कभी
    परिन्दे ख़्वाब के आँखों में घर बसाने लगे
    वाह !लोकेश जी , हमेशा की तरह सभी अशार अपनी जगह शानदार | मेरी शुभकामनायें और बधाई इस भावपूर्ण लेखन के लिए |

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  5. बहुत खूब...... ,लाजबाब गजल ,सादर नमस्कार

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  6. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना ....... ,.....4 दिसंबर 2019 के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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    1. मेरी रचना के चयन के लिए बहुत बहुत आभार

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  7. वफ़ा के ज़िक्र पे अंदाज़ ये रहा उनका
    झुका के आँख वो पलकों से मुस्कुराने लगे
    वाह!!!!
    एक से बढ़कर एक शेर
    बहुत ही लाजवाब गजल

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  8. बेहद खूबसूरत ग़ज़ल

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  9. बेहद उम्दा खूबसूरत ग़ज़ल ।

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  10. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 5.12.2019 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3560 में दिया जाएगा । आपकी उपस्थिति मंच की गरिमा बढ़ाएगी ।

    धन्यवाद

    दिलबागसिंह विर्क

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    1. मेरी रचना के चयन के लिए बहुत बहुत आभार

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  11. बहुत सुन्दर सर
    सादर

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