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बहारें अब न आएंगी

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कभी देखा नहीं तुमने कि ज़ख़्मों से भरा हूँ मैं फ़क़त जीने को इक पल के लिये हर पल मरा हूँ मैं
नज़रअंदाज़ मुझको इस तरह से दिल ये करता है कि जैसे अपने भीतर शख़्स कोई दूसरा हूँ मैं
ख़ुशी का ख़्वाब भी कोई कभी आता नहीं मुझको कसौटी पे तेरी ऐ ग़म बता कितना खरा हूँ मैं
ख़लल पड़ जाए न ख़्वाबों में तेरे नींद से मेरी ख़यालों की किसी आहट से भी कितना डरा हूँ मैं


खिज़ां कहती है मुझसे ये बहारें अब न आएंगी उम्मीदे वस्ल वजह से तेरी अब भी हरा हूँ मैं
रखा जब सामने उनके ये दिल तो हँस दिये खुलकर बता मुझको नदीश अब तू ही ये क्या मसखरा हूँ मैं

चित्र साभार- गूगल

झील

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याद के त्यौहार को तेरी कमी अच्छी लगी बात तपते ज़िस्म को ये शबनमी अच्छी लगी इसलिए हम लौट आए प्यास लेकर झील से ख़ुश्क लब को नीम पलकों की नमी अच्छी लगी
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ज़िन्दगी भी कहाँ अपनी होकर मिली गर ख़ुशी भी मिली, वो भी रोकर मिली मसखरा बन हँसाया जिन्हें उम्र भर मिला उनसे कुछ तो ये ठोकर मिली
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जो आँख से आंसू झरे, देख लेते नज़र इक मुझे भी अरे देख लेते हुए गुम क्यूँ आभासी रंगीनियों में मुहब्बत बदन से परे देख लेते
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चित्र साभार- गूगल

इज़्तिराब देखता हूँ

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मैं ज़ख़्म देखता हूँ न अज़ाब देखता हूँ शिद्दत से मुहब्बत का इज़्तिराब देखता हूँ
लगती है ख़लिश दिल की उस वक्त मखमली सी काँटों पे जब भी हँसता गुलाब देखता हूँ
दागों के अंधेरों में लगता है ज़र्द मुझको जब साथ-साथ तेरे माहताब देखता हूँ
हर जोड़ घटाने में अपनों के अंक ही हैं ज़ख़्मों का जब भी अपने हिसाब देखता हूँ
लगता है सच में मुझको शादाब दिल का सहरा जब आईने में तेरा शबाब देखता हूँ
पलकों की रोशनी में हो जाती है इज़ाफ़त आँखों में तेरी अपने जब ख़्वाब देखता हूँ
बस ऐ नदीश ये ही सांसों का फ़लसफ़ा है पानी में जब भी उठता हुबाब देखता हूँ
चित्र साभार- गूगल

बहार का लुत्फ़

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तन्हाई और तेरे इन्तिज़ार का लुत्फ़ पलकों पे गर्म अश्क़ों के करार का लुत्फ़
जिन आँखों में दफ़्न हुए गुलों के ख़्वाब देखा ही नहीं फिर कभी बहार का लुत्फ़
पहली तारीख को ही जेब खाली हो गई हम ले भी न पाए थे पगार का लुत्फ़
तेरी यादों की भीनी-भीनी पुरवाई में इक कड़क चाय और सिगार का लुत्फ़
सुलगे-सुलगे नदीश, अरमान दिल में अब तो आने लगा दिल से शरार का लुत्फ़
चित्र साभार- गूगल

रंग मुहब्बत का

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ख़्वाब-ए-वफ़ा के ज़िस्म की खराश देखकर इन आंसुओं की बिखरी हुई लाश देखकर जब से चला हूँ मैं, कहीं ठहरा न एक पल राहें  भी  रो  पड़ी  मेरी  तलाश  देखकर
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सांसों की फिसलती हुई ये डोर थामकर बेताब दिल की धड़कनों का शोर थामकर करता हूँ इन्तज़ार इसी आस में कि तुम आओगी कभी तीरगी* में भोर थामकर
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ख़िल्वत* की पोशीदा* पीर भेजी है तुमको ख़्वाबों की ताबीर* भेजी है रंग  मुहब्बत का  थोड़ा सा भर देना याद  की  बेरंग एक तस्वीर भेजी है
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तीरगी- अंधेरा ख़िल्वत- एकांत पोशीदा- छिपी हुई, गुप्त ताबीर- साकार 🔹 🔸 🔹 🔸 🔹
चित्र साभार- गूगल