अब अगर आओ तो



कितना मुश्किल ये अपनी ज़िन्दगी से मिलना है
अजनबी को जो किसी अजनबी से मिलना है

ऐ उम्मीद तूने तो देखा ज़रूर होगा उसे
मुझको एक बार किसी भी खुशी से मिलना है

दोस्तों के शहर में तो नहीं मिली मुझको
अब कहाँ जाऊँ, मुझे दोस्ती से मिलना है

हो चुका तंग फरिश्तों से रोज मिलते हुए
सच तो ये है कि मुझे आदमी से मिलना है

अब अगर आओ तो उसको भी साथ ले आना
नदीश मुझको तेरी बेबसी से मिलना है

लोकेश नदीश

टिप्पणियाँ

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (०९ -०६-२०२१) को 'लिप्सा जो अमरत्व की'(चर्चा अंक -४०९१ ) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  2. हो चुका तंग फरिश्तों से रोज मिलते हुए
    सच तो ये है कि मुझे आदमी से मिलना है
    वाह !!
    बहुत खूब ! अत्यंत सुन्दर सृजन ।

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  3. दोस्तों के शहर में तो नहीं मिली मुझको
    अब कहाँ जाऊँ, मुझे दोस्ती से मिलना है--बहुत खूब !

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  4. हो चुका तंग फरिश्तों से रोज मिलते हुए
    सच तो ये है कि मुझे आदमी से मिलना है
    बहुत खूब, लोकेश भाई।

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  5. मर्मस्पर्शी रचना। बहुत सुन्दर!

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  6. कितना मुश्किल ये अपनी ज़िन्दगी से मिलना है
    अजनबी को जो किसी अजनबी से मिलना है
    वाह !! बहुत खूब,सादर नमन आपको

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  7. ऐ उम्मीद तूने तो देखा ज़रूर होगा उसे
    मुझको एक बार किसी भी खुशी से मिलना है
    वाह!!!!
    लाजवाब सृजन।

    जवाब देंहटाएं

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